पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना: मनरेगा का नाम बदला और काम के दिन बढ़े
12 दिसंबर को केंद्रीय कैबिनेट ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का नाम बदलने और काम के दिनों की संख्या बढ़ाने वाले विधेयक को मंजूरी दी। अब इस योजना का नाम 'पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना' होगा और इसके तहत काम के दिनों की संख्या 100 से बढ़ाकर 125 कर दी जाएगी।
मनरेगा की वर्तमान स्थिति
मनरेगा योजना के तहत प्रत्येक पात्र ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों की रोजगार गारंटी दी जाती है। इस योजना को 2005 में शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षा प्रदान करना है। हालांकि समय के साथ, इस योजना में कई चुनौतियाँ और कमियाँ सामने आई हैं, जिन्हें अब सुधारने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
मनरेगा की चुनौतियाँ
मनरेगा के तहत 100 दिनों की रोजगार गारंटी देने के बावजूद केवल लगभग 7% परिवारों को ही पूरे 100 दिन का रोजगार मिलता है। इसमें सबसे बड़ी समस्या मजदूरी भुगतान में देरी है, जो बैंकिंग गड़बड़ियों और प्रशासनिक देरी के कारण होती है। कई बार जाब कार्ड में फर्जीवाड़ा भी पाया गया है और डिजिटल हाजिरी प्रणाली में तकनीकी गड़बड़ियाँ बढ़ी हैं।
इसके अलावा, कई क्षेत्रों में मनरेगा के तहत किए गए कार्य स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नहीं होते। बजट की कमी, कमजोर ऑडिट और स्थानीय स्तर पर निगरानी की कमी ने समस्याओं को और बढ़ाया है। इस कारण सरकार अब योजना के ढांचे में सुधार करने पर गंभीरता से विचार कर रही है।
वित्तीय ढांचे में सुधार और भविष्य की दिशा
हाल के दिनों में मनरेगा के वित्तीय ढांचे में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। अगले वर्ष, केंद्र सरकार देशभर में एक करोड़ नई जल संचय संरचनाओं का निर्माण करने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसे जनसहभागिता और मनरेगा के तहत उपलब्ध राशि से लागू किया जाएगा।
जल संरक्षण के लिए निधि आवंटन
जल संकट से प्रभावित क्षेत्रों में मनरेगा के फंड का बड़ा हिस्सा जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण के लिए आवंटित किया गया है। डार्क जोन जिलों में मनरेगा फंड का 65%, यलो जोन जिलों में 40% और सामान्य जिलों में 30% हिस्सा जल संरक्षण परियोजनाओं के लिए निर्धारित किया गया है।



