मप्र में सबसे अधिक विचाराधीन और सजा पाए आदिवासी कैदी
मध्यप्रदेश की जेलों में कैदियों की बढ़ती संख्या और विचाराधीन बंदियों की अधिकता एक बार फिर सार्वजनिक बहस का विषय बन गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा जेल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि प्रदेश की जेलों में बंद कुल कैदियों में लगभग 50 प्रतिशत विचाराधीन हैं, जिनमें सबसे अधिक संख्या आदिवासियों की है।
देशभर में कैदियों की संख्या के मामले में मध्यप्रदेश तीसरे स्थान पर है, जबकि पहले और दूसरे स्थान पर बिहार और उत्तर प्रदेश हैं। 17 जनवरी को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर साझा जानकारी के अनुसार प्रदेश की 132 जेलों में वर्तमान में 45,543 कैदी बंद हैं। राज्य की कुल जेल क्षमता लगभग 30 हजार है, जबकि वर्तमान संख्या क्षमता से करीब 152 प्रतिशत अधिक है। इससे जेलों में भीड़, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
नेता प्रतिपक्ष ने बताया कि प्रदेश में 22,946 कैदी विचाराधीन हैं, जिनके मामलों की सुनवाई अभी जारी है या आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं। इनमें 21 प्रतिशत आदिवासी, 19 प्रतिशत दलित और लगभग 40 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से हैं। इस प्रकार लगभग 80 प्रतिशत विचाराधीन कैदी सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आते हैं।
उमंग सिंघार का कहना है कि ये आंकड़े न्यायिक प्रक्रिया में व्याप्त असमानताओं की ओर संकेत करते हैं। गरीबी, कानूनी जानकारी की कमी और जमानत राशि जुटा न पाने के कारण हजारों लोग वर्षों तक जेल में बंद रहने को मजबूर हैं। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया।
इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियां भी महत्वपूर्ण हैं। शीर्ष अदालत ने लंबे समय तक विचाराधीन कैदियों को जेल में रखने को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए राज्यों को मामलों की नियमित समीक्षा करने और जमानत प्रक्रिया को सरल बनाने के निर्देश दिए हैं।
यदि सजा पाए कैदियों की बात करें, तो प्रदेश में लगभग 22 हजार दोषी कैदी हैं, जिनमें करीब आधी संख्या आदिवासी और दलित समुदाय से है। यह स्थिति जेल व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक ढांचे पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
उमंग सिंघार ने सरकार और न्यायपालिका से अपील की है कि विचाराधीन मामलों की सुनवाई में तेजी लाई जाए, जमानत से जुड़े नियमों को व्यवहारिक बनाया जाए और जेल सुधारों को प्राथमिकता दी जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जेलों की भीड़ और सामाजिक असमानता और अधिक गहराएगी।