साख का सवाल बना ग्रीनलैंड
ग्रीनलैंड, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप कहा जाता है, आज वैश्विक राजनीति की सबसे खतरनाक शतरंज की बिसात बन चुका है। ऊपर से शांत दिखने वाली बर्फ की चादर के नीचे ऐसे रहस्य दबे हो सकते हैं, जो पूरी दुनिया को हिला सकते हैं।
क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को खरीदने की जिद केवल एक रियल एस्टेट कारोबारी की सनक है, या इसके पीछे 500 ट्रिलियन डॉलर के संसाधनों की सोची-समझी रणनीति?
प्रोजेक्ट आइसवर्म: शीत युद्ध का खौफनाक सच
1960 के दशक में अमेरिका ने ग्रीनलैंड में प्रोजेक्ट आइसवर्म नामक एक गुप्त मिशन शुरू किया। इसका उद्देश्य बर्फ के नीचे लगभग 4000 किलोमीटर लंबी सुरंगें बनाकर 600 परमाणु मिसाइलें तैनात करना था, ताकि सोवियत संघ पर तुरंत हमला किया जा सके।
लेकिन ग्लेशियरों की तेज़ गति से खिसकने के कारण यह योजना विफल हो गई। अमेरिका को परियोजना छोड़नी पड़ी, लेकिन परमाणु कचरा और रेडियोएक्टिव ज़हर आज भी बर्फ के नीचे दबा हुआ है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण इसके समुद्र में मिलने का खतरा बढ़ता जा रहा है।
500 ट्रिलियन डॉलर का खजाना और चीन की चुनौती
ग्रीनलैंड आज सिर्फ बर्फ के लिए नहीं, बल्कि रेयर अर्थ मिनरल्स यानी “सफेद सोना” के लिए चर्चा में है। स्मार्टफोन से लेकर अत्याधुनिक F-35 फाइटर जेट तक इन्हीं खनिजों पर निर्भर हैं।
वर्तमान में इस बाजार पर चीन का दबदबा है, जो यहां अपनी पोलर सिल्क रोड रणनीति को आगे बढ़ा रहा है। अमेरिका को डर है कि यदि ग्रीनलैंड पर उसका नियंत्रण नहीं रहा, तो भविष्य की तकनीक पर उसका प्रभुत्व कमजोर पड़ सकता है।
ट्रंप की आक्रामक नीति और कूटनीतिक बवाल
ट्रंप ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर कूटनीतिक मर्यादाओं को दरकिनार कर दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्रीनलैंड के नागरिकों को 10 हजार से 1 लाख डॉलर तक देने के प्रस्ताव पर विचार किया गया। यानी सीधे पैसे के दम पर समर्थन खरीदने की कोशिश।
नॉर्वे के प्रधानमंत्री को लिखी ट्रंप की चिट्ठी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूचाल ला दिया। उन्होंने डेनमार्क के मालिकाना हक को खुले तौर पर चुनौती दी।
स्थानीय आक्रोश: “हम बिकाऊ नहीं हैं”
ग्रीनलैंड के लोगों ने साफ कर दिया है कि वे न तो बिकेंगे और न झुकेंगे। वरिष्ठ नेता टिली मार्टिनुसेन ने कहा कि वे अमेरिकी लालच और स्वदेशी अधिकारों के हनन से डरते हैं।
उन्होंने अलास्का का उदाहरण देते हुए चेतावनी दी कि अमेरिका पहले भी मूल निवासियों की जमीन छीन चुका है।
NATO बनाम ट्रंप और GIUK Gap
ट्रंप का दावा है कि नाटो वर्षों से डेनमार्क को रूसी खतरे की चेतावनी देता रहा है, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे नाटो की एकता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
सामरिक दृष्टि से GIUK Gap (ग्रीनलैंड–आइसलैंड–यूनाइटेड किंगडम) को “दुनिया का गला” कहा जाता है। दुनिया का लगभग 90 प्रतिशत इंटरनेट डेटा इसी रास्ते से गुजरता है।
सौभाग्य या विनाश?
ग्रीनलैंड आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। क्या यह संसाधनों का नया केंद्र बनेगा, या महाशक्तियों के लालच और परमाणु राजनीति के बीच एक नए युद्ध का मैदान?
आने वाला समय तय करेगा कि ग्रीनलैंड मानवता के लिए सौभाग्य बनेगा या विनाश का सितारा।



